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Wednesday, 18 January 2017

बहुजन मुक्ति पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष(युवा) जेडीयु में शामिल

दिल्ली निवासी पसमांदा फ्रंट के राष्ट्रिय अध्यक्ष एडवोकेट जाहिद ताज जो बहुजन मुक्ति पार्टी के युवा विंग के राष्ट्रिय अध्यक्ष हुआ करते थे कुछ कारणों के चलते उन्होंने बीएमपी से इस्तीफा दे दिया था. काफी समय बाद सोच विचार कर उन्होंने जनता दल यूनाईटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री माननीय नीतीश कुमार जी के निर्देश पर पार्टी के प्रधान राष्ट्रीय महासचिव व राज्यसभा सांसद माननीय केसी त्यागी के द्वारा पार्टी की सदस्यता गृहण की.

जाहिद ताज हमेशा से मजलूमों के हख के लिए लड़ते रहे है, और यह लड़ाई को आगे बढाने के लिए उन्होंने एक बहेतरीन प्लेटफार्म चुना. जाहिद ताज मजलूमों और बेसहाराओ के लिए एक उभरता हुआ युवा नेतृत्व है. पिछले विधानसभा में उन्होंने दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र तक मजलूमों के हख में आन्दोलन का जाल बिछाया था. लेकिन सही प्लेटफार्म ना मिलने के कारण वह कुछ दिनों के लिए रुक गए. अब जाकर उन्होंने यह फैसला लिया.




मुल्ले कटवाने लायक ही हैं, इन्हें देश से खदेड़ देना चाहिए, " अरे काहे, इन सालो को यही काट दो और इनकी लड़कियो को रख लो.

file photo

ऊपर वाली तीन लाइन पढ़ कर आप भी यही सोचेंगे की मैं भी असहिष्णु हूँ....
आइये अब हम मिलवाते हैं हिन्दुस्तानी मीडिया से जिसने अपनी क्षवि पूरे विश्व में एक वेश्या की तरह स्थापित कर ली है....

गत पांच दिसंबर को 'अमर उजाला' अखबार समेत कई अखबारो ने इस खबर को प्रमुखता से छापा था जिसका शीर्षक यह था -"मुस्लिम बहुल बांग्लादेश में काली माता के मंदिर को क्षतिग्रस्त किया गया" अब आप मीडिया की मानसिकता देखिये की जिस खबर का मुसलमानो से कोई लेना देना नहीं वहां मुस्लिम बहुल लिख रही है, चलो मान लेते हैं की मंदिर क्षतिग्रस्त करने वाले मुसलमान ही थे... तो क्या ये लिखना उचित और एक तरफ़ा ही न कहा जायेगा की परसो ... जिला मेरठ के अगवानपुर गाँव में एक मस्जिद के मीनार को तोड़कर जंगल में फेंक दिया गया, पूरे का पूरा क्षेत्र छावनी में बदला जा चूका है लेकिन सभी अखबारो में "शरारती तत्वों ने धर्मस्थल खंडित किया" ऐसी हेडिंग बनाई है बजाय ये लिखने के "हिन्दू बहुल भारत में मस्जिद को तोडा गया" लिखा गया है (जो क़ाबिल ए इत्तिफ़ाक़ बात है, होना भी यही चाहिए था)


ऊपर वाली तीन लाइन मेरी खुद्की सुनी हुई हैं, जब मैं बस में सफ़र कर रहा था तब कुछ आदमी बांग्लादेश की ये खबर पढ़कर अपनी अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर रहे थे। अगर मेरी जगह कोई और व्यक्ति होता तो दंगा उसी जगह से शुरू हो गया होता... "क्योंकि जाहिल लोगो की दोनों तरफ भरमार है।"


कुदरत का करिश्मा, दरगाह में नहीं काटते बिच्छू

सांप बिच्छू का नाम आते ही लोगों के सामने मौत का मंजर आ जाता है। क्या कभी आपने हाथों में बिच्छू को रखने की कल्पना की है? नहीं न, क्योंकि बिच्छू के काटते ही कुछ घंटो में मौत होना तय है। लेकिन हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसी जगह के बारे में जहां हज़ारों जहरीले बिच्छू होने के बाद भी वह आपको नहीं काटते।

उत्तर प्रदेश के अमरोहा में एक दरगाह है, जिसकी छतों, दीवारों और आस-पास के बगीचे के पेड़ों की जड़ों के पास से मिट्टी हटाने पर ढेरों बिच्छू निकलते हैं । करीब 800 साल पहले ईरान से सैयद सरबुद्दीन सहायवलायत ने अमरोहा में आकर डेरा डाला था । यहां रह पहले से रह रहे बाबा शाहनसुरूद्दीन ने इस पर एतराज जताया और एक कटोरे में पानी भरकर उनके पास भेजा। बिच्छू वाले बाबा ने कटोरे के ऊपर एक फूल रखकर उसे वापस कर दिया और कहा हम इस शहर में ऐसे रहेंगे जैसे कटोरे में पानी के ऊपर फूल।

इस पर बाबा शाहनसुरद्दीन ने बिच्छू वाले बाबा को बददुआ दी इस दरगाह में सांप-बिच्छू निवास करेंगे और शहर के खोये हुए गधे, घोड़े यहां मिलेंगे। इसके उत्तर में बिच्छू वाले बाबा ने हुक्म दिया कि आज से इस दरगाह में सांप बिच्छू किसी को काटोंगे नहीं और इसकी सीमा के भीतर कोई भी गधा, घोड़ा पेशाब या लीद आदि नहीं करेगा। इसके बाद सैयद सरबुद्दीन सहायवलायत बिच्छू वाले बाबा के नाम से जाने जाने लगे।

इस दरगाह के बारे में यह भी कहा जाता है कि सांप, बिच्छू दरगाह के आस-पास किसी को भी नहीं काटते लेकिन दरगाह के बाहर निकलते ही वे आदमी को डस लेते हैं।

यहां यह भी मान्यता है कि कोई व्यक्ति इन बिच्छुओं को सप्ताह या दस दिन के लिए बाबा से इजाजत लेकर दरगाह से बाहर कहीं ले जाता है तो वे उसे नहीं काटते। लेकिन निर्धारित अवधि पूरी होते ही वे उसे तुरंत काट लेते हैं।